मानव तस्करी संगठित अपराधों के लिए लाभ के स्रोत का तीसरा सबसे बड़ा हिस्सा

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नैनीताल : उत्तराखंड न्यायिक एवं विधिक अकादमी व नैनीताल हाईकोर्ट की ओर से आयोजित मानव तस्करी, लैंगिक न्याय और कमजोरों के उत्थान विषयक सेमिनार का सोमवार को समापन हो गया है। इस मंथन में जो बातें निकलकर सामने आई उसमें महसूस किया गया कि न्यायिक प्रणाली को निरंतर अपडेट करने के साथ सयम के साथ सुधार की आवश्यकता है। ऑडिटोरियम में दिवस पर आयोजित सत्रों में निष्कर्ष निकला कि मानव तस्करी संगठित अपराधों के लिए लाभ के स्रोत का तीसरा सबसे बड़ा हिस्सा है। तस्करी श्रम, वेश्यावृत्ति, जबरन विवाह, घरेलू दासता, गोद लेने, भीख मांगने, अंग व्यापार, नशीली दवाओं के कूरियर, हथियारों की तस्करी आदि जैसे विभिन्न उद्देश्यों के लिए होती है। मानव तस्करी केवल एक कानून प्रवर्तन मुद्दा नहीं है, बल्कि एक जघन्य अपराध है।तस्करी मूल गरिमा और आत्म सम्मान के साथ जीने के अधिकार सहित मानवाधिकार प्रभावित करता है। मानव तस्करी के खतरे को रोकने के लिए सभी हितधारकों द्वारा ठोस और संयुक्त प्रयास आवश्यक हैं, इस संगठित अपराध के खिलाफ सूक्ष्म प्रयास वांछित परिणाम नहीं दे सकते हैं। न्यायपालिका तस्करी की गई महिलाओं और बच्चों की आखिरी उम्मीद है। अवैध व्यापार करने वालों की शक्ति के लिए आखिरी चुनौती भी है, इसलिए न्यायिक अधिकारियों को मानव तस्करी के मामलों से निपटने के लिए संवेदनशील और प्रभावी ढंग से सुसज्जित होने की आवश्यकता है।इसी तरह, जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों को अपनी जांच तकनीकों को अधिक वैज्ञानिक और आधुनिक बनाने के लिए संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। यह भी आवश्यक महसूस किया गया कि आईटीपीए के प्रचलित प्रावधान बहुत प्रभावी सिद्ध नहीं हुए हैं, इसलिए जब तक इन्हें और सख्त नहीं किया जाता, तब तक तस्करी के सभी मामलों में आईपीसी की धारा 370 का इस्तेमाल जरूरी है।खुली चर्चा हुई और विचार-विमर्श से यह बात सामने आई कि ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के साथ समाज में भेदभाव किया जाता है। उन्हें पुलिस, परिवार द्वारा प्रताड़ित किया जाता है। जनता दुर्व्यवहार करती है। सुप्रीम कोर्ट ने देश मे ट्रांसजेंडर व्यक्ति को थर्ड जेंडर के तौर पर मान्यता दी गई है। कहा है कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति बुनियादी मानवाधिकारों और सरकार के सभी कल्याणकारी उपायों के भी हकदार हैं। यह किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति की गलती नहीं है कि आसपास के लोग अपनी पहचान नहीं बना पा रहे हैं, जरूरत इस बात की है कि ट्रांसजेंडरों के प्रति नजरिया बदलें।सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एस रवींद्र भट्ट, न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया, नैनीताल हाईकोर्ट के मुख्य न्यायमूर्ति विपिन सांघी, वरिष्ठ न्यायमूर्ति एसके मिश्रा, न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी, न्यायमूर्ति आलोक कुमार वर्मा, न्यायाधीश, पूर्व न्यायाधीश यूसी ध्यानी, पूर्व जिला जज डॉ जीके शर्मा, पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश, रजिस्ट्रार जनरल विवेक भारती शर्मा, उजाला के निदेशक नितिन शर्मा, अपर निदेशक एमएम पांडे, डीजीपी अशोक कुमार, पांच जिलों के जिलाधिकारी, जिला पुलिस प्रमुख, जिला जज, जिला प्रोबेशन अधिकारी समेत न्यायिक अधिकारी आदि।

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