देहरादून। बोल बम हर-हर महादेव के जयकारें के साथ कई सौ किलोमीटर की पैदल कांवड़ यात्रा आरम्भ हो चुकी हैं। 15 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में उत्तराखंड में ही 4 करोड़ से अधिक भक्त गंगाजल लेने पहुंचते हैं। यह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सनातन, संस्कृति, अनुशासन, तप, सेवा और सामूहिक आस्था का ऐसा विराट पर्व है, जिसकी मिसाल दुनिया में कम ही देखने को मिलती है। हर साल करोड़ों श्रद्धालु हरिद्वार, ऋषिकेश, गंगोत्री और गौमुख जैसे पवित्र स्थलों से गंगाजल लेकर अपने-अपने क्षेत्र के शिवालयों में भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा की जड़ें समुद्र मंथन की कथा से जुड़ी मानी जाती हैं। जब समुद्र मंथन से हलाहल विष निकला तो समस्त सृष्टि को बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान किया। विष की तीव्रता से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे अत्यधिक ताप से परेशान हो उठे. तब देवताओं ने विभिन्न पवित्र नदियों का जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया, जिससे उन्हें शीतलता मिली। माना जाता है कि तभी से सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा प्रारंभ हुई। भगवान परशुराम पहले ऐसे शिवभक्त थे जिन्होंने गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक किया। कांवड़ यात्रा केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके ऐतिहासिक प्रमाण भी मिलते हैं। लकड़ी से बनी वह संतुलित संरचना होती है, जिसे श्रद्धालु अपने दोनों कंधों पर रखते हैं। इसके दोनों सिरों पर गंगाजल से भरे कलश या पात्र बांधे जाते हैं। पूरी यात्रा के दौरान श्रद्धालु इस जल को अत्यंत पवित्र मानते हुए उसकी शुद्धता बनाए रखते हैं। मान्यता है कि जिस जल को गंगा से भर लिया गया, उसे बिना किसी अपवित्रता के सीधे शिवलिंग पर ही अर्पित किया जाना चाहिए। यही कारण है कि कांवड़ को भूमि पर रखने से बचा जाता है। इसके लिए विशेष स्टैंड का उपयोग किया जाता है। आम लोगों को भी इस बात का ध्यान रखना होता है कि शिव भक्त जब कावड़ लेकर जाएं तो पूरी कोशिश करें की उन्हे पहले आने जाने दें. कोशिश यह भी रहे कि किसी तरह का स्पर्श कांवड़ से कोई और न करे। ग्रंथों मे पैदल कांवड़ का ही महत्व माना गया है. धार्मिक दृष्टि से पैदल कांवड़ को अधिक पुण्यदायी होती है।

